युक्तियुक्तकरण बना मज़ाक, शिक्षक और पालक दोनों परेशान,शिक्षा व्यवस्था की बदहाली उजागर…

खबर शेयर करे।।

बिलाईगढ़-छत्तीसगढ़ में शिक्षा को लेकर सरकार लगातार प्रयासरत है, योजनाएं बन रही हैं, घोषणाएं हो रही हैं और धरातल पर सुधार की बातें हो रही हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे एकदम उलट नज़र आती है। राज्य के यशस्वी मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के निर्देशानुसार शिक्षा विभाग द्वारा राज्यभर में “युक्तियुक्तकरण” की प्रक्रिया को लागू किया गया था, जिसका उद्देश्य था, स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या के अनुपात में शिक्षकों की तैनाती सुनिश्चित करना, ताकि बच्चों की शिक्षा में गुणवत्ता लाई जा सके।

इस नीति के तहत ऐसे विद्यालय जहां शिक्षक अधिक थे (अतिशेष), वहां से शिक्षकों को हटाकर ऐसे स्कूलों में भेजना था जहाँ शिक्षक कम हैं। इस प्रक्रिया से शिक्षा व्यवस्था को संतुलित करने की उम्मीद की जा रही थी, लेकिन दुर्भाग्यवश यह योजना अपने उद्देश्य को पूरा करने में पूरी तरह विफल होती नज़र आ रही है।

बिलाईगढ़ में युक्तियुक्तकरण का असली चेहरा…

सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिला शिक्षा के क्षेत्र में पहले ही संसाधनों की कमी और शिक्षकों के अभाव से जूझ रहा है। अब युक्तियुक्तकरण की प्रक्रिया ने स्थिति को और भी अधिक गंभीर बना दिया है।

विकासखंड बिलाईगढ़ के कई स्कूलों में युक्तियुक्तकरण के नाम पर पहले से पदस्थ शिक्षकों को हटा दिया गया, और उन्हीं स्कूलों में कुछ समय बाद पुनः अन्य शिक्षकों की नियुक्ति कर दी गई। इससे साफ़ है कि पूरी प्रक्रिया न केवल अपारदर्शी थी बल्कि असंवेदनशील भी रही।

नियमानुसार, 60 से कम दर्ज संख्या वाले स्कूल में दो शिक्षकों की नियुक्ति और 60 से अधिक वाले स्कूल में तीन शिक्षकों की नियुक्ति होनी चाहिए। लेकिन ज़मीनी सच्चाई कुछ और ही बयां करती है।

नियमों का खुला उल्लंघन…

सरकारी प्राथमिक शाला धौराभाठा (ब) में मात्र 20 विद्यार्थियों की दर्ज संख्या है, पर वहां तीन शिक्षक पदस्थ हैं। ऐसी ही स्थिति कोरकोटी, पवनी, सिंघीटार, लिमतरी, नावापारा, मुच्छमल्दा, अमोदी जैसे गांवों की प्राथमिक शालाओं में देखने को मिलती है, जहाँ पचास से भी कम विद्यार्थियों पर तीन-तीन शिक्षक कार्यरत हैं।

दूसरी ओर, सलिहा जैसे वनांचल क्षेत्र में बसे आदिवासी बहुल गांव की हालत दयनीय है। यहां की प्राथमिक शाला डीपापारा, सलिहा में 71 विद्यार्थियों पर मात्र एक शिक्षक कार्यरत है, जबकि उच्च प्राथमिक शाला में 88 विद्यार्थियों पर दो शिक्षक। यह स्थिति युक्तियुक्तकरण की नीतियों की असफलता को उजागर करती है।

गांव वालों का फूटा आक्रोश…

डीपापारा सलिहा की शाला प्रबंधन एवं विकास समिति के अध्यक्ष समेत स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि पहले इन दोनों स्कूलों में 100 से अधिक विद्यार्थी पढ़ते थे। लेकिन शिक्षक नहीं होने के कारण पालकों ने अपने बच्चों का दाखिला निजी विद्यालयों में करा दिया।इससे दोहरा नुकसान हो रहा है,एक तरफ़ सरकारी स्कूलों में दर्ज संख्या घट रही है, जिससे शिक्षकों की नियुक्ति में और अधिक कटौती की जा रही है, और दूसरी ओर, आर्थिक रूप से कमजोर पालक मजबूरी में निजी स्कूलों की महंगी फीस चुकाने को विवश हैं।

शिक्षा गुणवत्ता वर्ष पर सवाल…

राज्य सरकार इस वर्ष को “शिक्षा गुणवत्ता वर्ष” के रूप में मना रही है, लेकिन यदि यही स्थिति रही, तो शिक्षा की गुणवत्ता में कैसे सुधार होगा?

बिलाईगढ़ विकासखंड में जो हालात हैं, वे यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या अधिकारी वर्ग ने कभी इन क्षेत्रों का दौरा किया है? क्या ज़मीनी हकीकत की जांच की गई है? और अगर की गई है, तो फिर ऐसी अव्यवस्थित पदस्थापन क्यों?
शिक्षकों की असमान तैनाती से स्कूलों में पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है। जिन स्कूलों में शिक्षक ज़रूरत से ज्यादा हैं, वहां शिक्षक समय बिताने की औपचारिकता निभा रहे हैं, जबकि जिन स्कूलों में शिक्षक कम हैं, वहां एक ही शिक्षक को कई कक्षाओं को पढ़ाना पड़ रहा है, जिससे बच्चों की पढ़ाई की गुणवत्ता गिर रही है।

शिक्षक भी परेशान, मनोबल गिरा…

युक्तियुक्तकरण की प्रक्रिया से न केवल छात्र और पालक परेशान हैं, बल्कि शिक्षक वर्ग भी इससे आहत है। जिन शिक्षकों को दूरदराज या दुर्गम क्षेत्रों में भेजा गया है, उन्हें आने-जाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। कई बार बिना किसी सूचना या विकल्प के स्थानांतरण कर दिया जाता है, जिससे पारिवारिक और मानसिक तनाव भी बढ़ा है।
कुछ शिक्षकों का कहना है कि विभाग ने पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं बरती। स्थानांतरण की सूची में किन आधारों पर नाम शामिल किए गए, इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। इससे शिक्षा विभाग के प्रति शिक्षक वर्ग का विश्वास भी डगमगा रहा है।

लेकिन जब तक यह सुधार ज़मीनी स्तर पर नहीं होता, तब तक छात्रों और शिक्षकों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

शिक्षा में सुधार के लिए ठोस कदम ज़रूरी…

सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाएं तभी सफल होंगी जब वे केवल कागजों तक सीमित न रहें, बल्कि उनकी क्रियान्वयन प्रक्रिया ईमानदारी और पारदर्शिता से हो।युक्तियुक्तकरण की जो मंशा थी,शिक्षा में समानता और गुणवत्ता वह तब तक पूरी नहीं हो सकती जब तक सही स्कूलों में सही शिक्षक नहीं पहुँचते।
बिलाईगढ़ जैसे पिछड़े क्षेत्रों में जहां शिक्षा की स्थिति पहले से ही गंभीर है, वहां इस तरह की असंगत नीतियों से स्थिति और भी बदतर हो गई है।

शिक्षा की गुणवत्ता तभी आ सकती है जब शिक्षक, पालक, और विद्यार्थी तीनों के हितों को ध्यान में रखते हुए योजनाएं बनाई और लागू की जाएं।

फिलहाल तो ऐसा लगता है कि युक्तियुक्तकरण, बच्चों की पढ़ाई में बाधा और शिक्षक-पालक के लिए सिरदर्द बन गया है।

WhatsApp Image 2024-12-29 at 14.32.07_afb4a18e
WhatsApp Image 2024-12-29 at 14.32.06_4e1d3938
error: Content is protected !!
BREAKING