छत्तीसगढ़ की जुझारू बेटी हेमा बसंत ने किया राज्य का नाम रोशन…

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बिलाईगढ़-छत्तीसगढ़ के खेल परिदृश्य में एक नया अध्याय लिखते हुए सारंगढ़ बिलाईगढ़ जिले के नगर पंचायत पवनी की खिलाड़ी हेमा बसंत ने अपने अदम्य साहस, तकनीकी दक्षता और अनुशासन के साथ राज्य और देश के मंच पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। 25 से 30 अक्टूबर 2025 तक गुजरात के सूरत में आयोजित 16वीं नेशनल कुडो चैम्पियनशिप, 6वीं फेडरेशन कप एवं 17वीं अक्षय कुमार इंटरनेशनल कुडो टूर्नामेंट (2025-26) में उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है।

शानदार प्रदर्शन…

इन प्रतिष्ठित प्रतियोगिताओं में हेमा ने सीनियर अंडर-21 की श्रेणी में तीन कांस्य पदक जीतकर छत्तीसगढ़ का नाम रोशन किया एक ऐसी उपलब्धि जो राज्य के युवा खिलाडियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी।

प्रतियोगिता में देशभर से सैकड़ों खिलाड़ी शामिल थे, लेकिन हेमा ने न सिर्फ भाग लिया, बल्कि तीन पदक जीतकर यह सिद्ध कर दिखाया कि जब तैयारी सही हो और मन में दृढ़ विश्वास हो, तो मंजिल करीब होती है।
उन्होंने अनुशासन, समर्पण और तकनीक के साथ खेला।इसी ने उन्हें प्रतियोगिता के कठिन क्षणों में भी अन्य खिलाड़ियों से अलग दिखाया।

संघर्षों के बावजूद आगे…

छत्तीसगढ़ में खेल-संस्कृति धीरे-धीरे विकसित हो रही है और ऐसे में हेमा जैसा खिलाड़ी निकलना इस विकास का सकारात्मक संकेत है।

उनका सफर आसान नहीं रहा योग्यता, उत्कृष्ट कोचिंग, सही अवसर और निरंतर प्रेरणा की जरूरत होती है। उनके कोच भूपत साहू ने विशेष रूप से उनकी मेहनत, संयम और खेल के प्रति जवाबदेही को सराहा है।

राज्य के कोषाध्यक्ष सहित अन्य अधिकारी भी उन्होंने इस सफलता को राज्य की युवा पीढ़ी को प्रेरित करने वाला बताया है।

उपलब्धि का महत्व…

तीन पदक जितने की उपलब्धि ही उल्लेखनीय है क्योंकि यही एक खिलाड़ी ने एक ही प्रतियोगिता में राज्य के लिए तीन अलग-अलग उपलब्धियाँ हासिल कीं।

यह सफलता केवल हेमा-बसंत व्यक्तिगत रूप से नहीं है, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ की खेल संस्कृति और महिला-खिलाड़ियों के मजबूती के प्रतीक बन चुकी है।

अकादमी परिवार ने भी कहा है कि हेमा की मेहनत, अनुशासन और आत्मविश्वास यह सिद्ध करता है कि छत्तीसगढ़ की बेटियाँ किसी भी मंच पर उत्कृष्टता साबित कर सकती हैं।

आगे की दिशा…

अब चूंकि हेमा ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बना ली है, आगे उनके लिए कुछ महत्वपूर्ण बातें हैं:

अंतरराष्ट्रीय मंच…इस सफलता को आगे बढ़ाते हुए अब अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में सहभागिता और पदक की दिशा में काम करना होगा।

शिक्षा-संयोजन…खेल तथा शिक्षा को संतुलित रखते हुए आगे की पढ़ाई और कोचिंग पर भी ध्यान देना होगा, ताकि खेल जीवन के साथ-साथ शिक्षा-करियर भी संतुलित रहे।

प्रकाशित उदाहरण…हेमा अब युवा खिलाड़ियों के लिए रोल-मॉडल बन चुकी हैं उन्हें अपनी उपलब्धि का सामाजिक प्रसार करना चाहिए, ताकि प्रेरणा का सिलसिला जारी रहे।

प्रशिक्षण एवं फिटनेस…कुडो जैसे मुकाबली खेल में शारीरिक और मानसिक तैयारी मील का पत्थर होती है आगे और बेहतर कोचिंग, प्रशिक्षण सुविधाएँ, पोषण एवं रिकवरी की व्यवस्था जरूरी होगी।

खेल का परिप्रेक्ष्य…

कुडो एक ऐसा मार्शल-आर्ट खेल है जिसमें कराटे, जुडो, जुजुत्सु, मयथाई और किकबॉक्सिंग की तकनीकें सम्मिलित हैं,इसे सुरक्षित, वैज्ञानिक और आधुनिक मिश्रित मार्शल आर्ट के रूप में परिभाषित किया जाता है।

इस खेल की स्वयं छत्तीसगढ़ में संघ-संगठन मौजूद है।
इस तरह की उपलब्द्धियों से राज्य में खेलों की भूमिका और महत्व बढ़ेगा, और खेल-संस्कार युवाओं के बीच विस्तारित होगा।

सारंगढ़ की हेमा बसंत ने अपनी लगन, साहस और निरंतर प्रयास के बल पर देश-स्तर पर छत्तीसगढ़ का गौरव बढ़ाया है। तीन पदक जीतकर उन्होंने साबित कर दिया है कि सीमित संसाधनों के बावजूद यदि इरादा मजबूत हो, मेहनत त्यागपूर्वक हो, तो नतीजे शानदार आते हैं। यह उपलब्धि न केवल व्यक्तिगत सफल ता है बल्कि एक प्रेरणा-स्रोत है खासकर उन युवा-खिलाड़ियों के लिए जो खेल में आगे बढ़ना चाहते हैं।
उनकी इस उपलब्धि पर कोच, परिवार, अकादमी और पूरे राज्य को गर्व है। भविष्य में भी हेमा से ऐसे और ही उपलब्धियों की आशा है और उसके साथ छत्तीसगढ़ के खेल-दृश्य में नई ऊँचाइयाँ देखने को मिलेंगी।

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